राष्ट्र की चिंता करते थे श्यामा प्रसाद मुखर्जी

विचार : राजनीतिक दल जनसंघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी बड़े राष्ट्रभक्त थे। बीते समय की राजनीतिक बात करें तो बहुत कम राजनेता थे, जो देशवासियों और राष्ट्र के हित की बात करते थे, कमोवेश यही स्थिति आज भी है। बस थोड़ा सा अंतर यह आया है कि राष्ट्रप्रेमियों की संख्या में थोड़ी सी बढ़ोत्तरी हुई है। गौरतलब है कि अंगे्रजों से आजादी मिलने के बाद अधिकतर राजनेताओं ने पहले तो अपनी तिजोरी भरी और खूब ऐश—ओ—आराम किया। लेकिन कुछ राजनेता थे, जिन्हें देश की गरीबी नहीं देखी जाती थी, विश्व में भारत के बारे गलत धारणा जो थी, उससे व्यथित रहते थे, जम्मू—कश्मीर की तत्कालीन स्थिति मंजूर नहीं था। ऐसे ही एक राजनेता थे श्यामा प्रसाद मुखर्जी, जो शुरुआत में तो थे कांगे्रसी लेकिन उन्होंने इस्तीफा दे दिया था। दरअसल अप्रैल 1950 में भारत और पाकिस्तान ने नेहरू-लियाकत समझौता किया था। इसमें दोनों देशों ने अपने-अपने देशों में रह रहे अल्पसंख्यकों के अधिकारों को सुरक्षित करने का वादा किया था। इसके अलावा शरणार्थियों और उनकी सम्पत्ति की सुरक्षा का अाश्वासन दिया गया था। भविष्य में दोनों देशों के बीच युद्ध की संभावनाओं को खत्म करने की बात भी कही गई थी। समझौते के तहत दोनों देशों ने अल्पसंख्यक आयोग गठित किए थे। इस समझौते के लिए दोनों देशों के अधिकारियों के बीच नई दिल्ली में छह दिनों तक बातचीत हुई। इसके बाद भारत की ओर से तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु और पाकिस्तान की ओर से प्रधानमंत्री लियाकत अली खा़न ने समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। केंद्रीय मंत्री श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने इस समझौते का विरोध किया था और बाद में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सर-संघचालक गुरु गोलवलकर से परामर्श लेकर श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने 21 अक्टूबर 1951 को राष्ट्रीय जनसंघ की स्थापना की, जिसका बाद में जनता पार्टी में विलय हो गया और फिर पार्टी के बिखराव के बाद 1980 में भारतीय जनता पार्टी का गठन हुआ। 1951-52 के आम चुनावों में राष्ट्रीय जनसंघ के तीन सांसद चुने गए जिनमें एक मुखर्जी भी थे। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का जन्म 6 जुलाई 1901 को कोलकाता के अति प्रतिष्ठित परिवार हुआ था। डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी पिता सर आशुतोष मुखर्जी प्रतिभा के धनी थे व शिक्षाविद् के रूप में प्रसिद्ध थे। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी कोलकाता विश्वविद्यालय से स्नातक होने के पश्चात श्री मुखर्जी 1923 में सेनेट के सदस्य बने। 1924 में पिता की मृत्यु के बाद उन्होंने कोलकाता हाई कोर्ट में वकालत के लिए पंजीकरण कराया। 1926 वह इंग्लैंड गए, जहाँ लिंकन्स इन से मुखर्जी ने 1927 में बैरिस्टर की परीक्षा उत्तीर्ण की। 33 वर्ष की आयु में मुखर्जी कोलकाता विश्वविद्यालय के कुलपति नियुक्त हुए और विश्व का सबसे युवा कुलपति होने का सम्मान प्राप्त किया। मुखर्जी 1938 तक इस पद पर रहे। डॉ. मुख़र्जी के राजनीतिक जीवन की शुरुआत सन 1929 में हुई जब उन्होंने कांग्रेस पार्टी के टिकट पर बंगाल विधान परिषद् में प्रवेश किया, लेकिन जब कांग्रेस ने विधान परिषद् के बहिष्कार का निर्णय लिया तब उन्होंने इस्तीफा दे दिया। इसके बाद उन्होंने स्वतंत्र उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ा और चुने गए। सन 1941-42 में वह बंगाल राज्य के वित्त मंत्री रहे। सन 1937 से 1941 के बीच जब कृषक प्रजा पार्टी और मुस्लिम लीग की साझा सरकार थी तब वो विपक्ष के नेता थे और जब फजलुल हक़ के नेतृत्व में एक प्रगतिशील सरकार बनी तब उन्होंने वित्त मंत्री के तौर पर कार्य किया लेकिन एक वर्ष बाद ही इस्तीफा दे दिया। विशिष्ट रणनीति से उन्होंने मुस्लिम लीग के प्रयासों को पूरी तरह से नाकाम कर दिया। 1942 में ब्रिटिश सरकार ने विभिन्न राजनीतिक दलों के छोटे-बड़े सभी नेताओं को जेलों में डाल दिया। पंडित जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें अंतरिम सरकार में उद्योग एवं आपूर्ति मंत्री के रूप में शामिल किया था।

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