प्राकृतिक तौर पर उगने वाली सोलाई बूटी के सफेद फूलों से मिलता है सफेद शहद

जानकारी : सफेद शहद जिसे सोलाई शहद कहते हैं, सिर्फ सोलाई बूटियों के सफेद फूल से ही प्राप्त होता है। इसकी खासियत है कि इसमें अलग महक होती है और स्वाद भी आम शहद की तुलना में बेहतर होता है। यही कारण है कि सोलाई शहद की काफी मांग है। जम्मू कश्मीर के पहाड़ी क्षेत्रों में सोलाई की झाड़ीनुमा बूटियां प्राकृतिक रूप से उगती हैं। पौधों में सितम्बर के महीने में सफेद फूल आते हैं। इनके फूलों का सीजन केवल एक माह का ही होता है। इसी समय दूरदराज के मधुमक्खी पालक जम्मू के पहाड़ी व कश्मीर के कुछ भागों में मधुमक्खी की कॉलोनियों को लेकर पहुंचते हैं। मधुमक्खियां सफेद फूल से रस निकाल कर सोलाई शहद बनाती हैं। मधुमक्खी पालक यह शहद सीधे व्यापारियों को बेचते हैं। जम्मू के किश्तवाड़, डोडा, गूल, रामबन, अरनास, संगलदान, बनिहाल के अलावा कश्मीर के बांडीपोरा, कुपवाड़ा व त्राल जैसे ठंडे क्षेत्रों में सोलाई की बूटियां मुख्य तौर पर पाई जाती हैं। जम्मू कश्मीर में करीब 650 हेक्टेयर में यह बूटियां पाई जाती हैं। हालांकि यह सोलाई बूटियां हिमाचल प्रदेश के चंबा व उत्तराखंड के कुछ हिस्से में भी होती हैं, मगर जम्मू कश्मीर में इसका क्षेत्रफल अधिक है। मधुमक्खी पालकों को यहां से अच्छा शहद प्राप्त करने की उम्मीद रहती है। 
सोलाई शहद की बाजार में बेहद मांग है। एक किलो शहद पाने के लिए आपको 700 से 750 रुपये खर्च करने पड़ेंगे जबकि मल्टी फ्लोरा या दूसरा शहद 350 से 400 रुपये तक मिल जाएगा। सोलाई शहद सफेद रंग के कारण अन्य शहद से अलग दिखता है। इसलिए इसकी हर ओर बहुत मांग है। अपने स्वाद व सफेद रंग के कारण देश में पहचान बनाने वाले सोलाई शहद पर साल दर साल संकट गहराता जा रहा है। इससे जम्मू कश्मीर के मधुमक्खी पालकों की भी चिंता बढ़ गई है। दरअसल जिन झाड़ीनुमा सोलाई की बूटियों के फूलों से यह शहद प्राप्त होता है, वह लगातार खत्म हो रही हैं। नई बूटियां लगाने के लिए राज्य प्रशासन की कोई योजना नहीं। ग्रामीण क्षेत्रों में धड़ल्ले से इसका उपयोग ईंधन के रूप में भी किया जा रहा है।

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