पाकिस्तान को झटके पर झटका


  • कैनबरा में हुई एफएटीएफ के एशिया प्रशांत समूह की बैठक में पाकिस्तान 42 सदस्यीय पैनल के सामने निर्धारित मानकों में खरा नहीं उतर पाया। इस फैसले के बाद पाक को हाल ही में अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं से मिले ऋण भी खतरे में पड़ सकते हैं। 


विचार : पाकिस्तान की धरती से दुनिया के तमाम देशों में आतंक का निर्यात हो रहा है। आतंकी गतिविधियों के लिये धन मुहैया कराने व धन शोधन करने वाले देशों पर निगरानी रखने वाली वैश्विक संस्था फाइनेंशियल एक्शन टास्कफोर्स यानी एफएटीएफ की एशिया-प्रशांत इकाई ने पाक को काली सूची में डाल दिया है। दशकों से भारत व अन्य देशों में आतंकवाद को बढ़ावा दे रहे पाक के खिलाफ अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं को तमाम पुख्ता सबूत देकर भारत ने जो मुहिम चलायी थी, वह रंग लायी है। पहले ही आर्थिक संकट से जूझ रहे पाकिस्तान के लिये अब आने वाला समय बेहद मुश्किलों भरा होने वाला है। तमाम वैश्विक वित्तीय संस्थाएं उसे अब आर्थिक मदद देने से कतराएंगी। दरअसल, एफएटीएफ के एशिया प्रशांत समूह ने पाया कि पाक ने मनी लांड्रिंग और आतंकवाद के वित्त पोषण संबंधी कुल 40 मानकों में से 32 का अनुपालन नहीं किया। आस्ट्रेलिया के कैनबरा में आयोजित संस्था की बैठक में पाया गया कि आतंकवादियों को धन उपलब्ध कराने व धन शोधन के ग्यारह प्रभावी मानकों में से दस में पाक खरा नहीं उतरा। दरअसल, बीते वर्ष एफएटीएफ ने पाकिस्तान को ग्रे लिस्ट में डाल दिया था। अब पाक पर अंतिम निर्णय लेने के लिए अक्तूबर में एफएटीएफ की बैठक होगी, जो पाक के लिये गंभीर संकट की आहट है। पहले ही खस्ताहाल अर्थव्यवस्था से जूझ रहे पाक को अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष, विश्वबैंक और यूरोपीय संघ आदि से मदद लेना अब मुश्किल हो जायेगा। ये वित्तीय संस्थाएं पाक की वित्तीय साख गिरा देंगी, जिससे वित्तीय संकट से जूझ रहे पाक की स्थिति और विस्फोटक हो सकती है। दरअसल, एफएटीएफ आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद जैसे आतंकी संगठनों की फंडिंग पर नजर रखती रही है। निगरानी के लिये पाक को ग्रे लिस्ट में रखा गया था। लेकिन पाक ने आतंकी संगठनों के खिलाफ महज दिखावे के लिये कार्रवाई की है।
दरअसल, एफएटीएफ एक अंतर-सरकारी संस्था है, जो मुख्य रूप से मनी लॉन्ड्रिंग, आतंकवाद को फंडिंग तथा अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय व्यवस्था के लिये उत्पन्न खतरों से निपटने के उपायों पर काम करती है। ऐसे देशों की निगरानी करके संस्था विधायी व नियामक सुधारों के लिये दबाव बनाती है। चिन्हित देशों को अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थान व संस्थाएं कर्ज देना बंद कर देते हैं, जिससे इन देशों के अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में भारी गिरावट आ जाती है। ग्रे लिस्ट एक तरह की चेतावनी होती है कि इस देश को कर्ज देने में जोखिम है। पाक को वर्ष 2012 से 2015 तक ग्रे लिस्ट में डाला गया था। फिर 2018 में एफएटीएफ ने पाक को पुन: ग्रे लिस्ट में डाला। तभी पिछले वर्षों में अंतर्राष्ट्रीय कर्जदाताओं ने पाक को आर्थिक मदद व कर्ज में कटौती की है। फलत: पाक की आर्थिक स्थिति खराब होती चली गई। अब काली सूची में शामिल होने से पाक को वैश्विक संस्थाओं से ऋण मिलना और मुश्किल हो जायेगा। साथ ही मूडीज व स्टैंडर्ड एंड पूअर्स जैसी वैश्विक वित्तीय संस्थाएं पाक की रेटिंग गिरा देंगी। दरअसल, यह रेटिंग तय करती है कि किस देश में निवेश किया जा सकता है। बाहरी निवेश बंद होने से पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था की कमर टूट सकती है। फिर पाक विश्व बैंक तथा आईएमएफ से ताजा ऋण नहीं ले सकेगा। दरअसल, एफएटीएफ ने पाक को ब्लैकलिस्ट से बचने के लिये 27 सूत्रीय एक्शन प्लान सौंपा था। साथ ही आतंकवादियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई के लिये 15 माह दिये थे, जिसकी सीमा अक्तूबर में समाप्त हो रही है। 

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