प्राकृतिक आपदा से निपटने के लिए जीवाश्म-ईंधन से होने वाले कार्बन उत्सर्जन को रोकना ही काफी नहीं

विश्ललेषण : जलवायु परिवर्तन संबंधी अंतर-सरकारी समिति (आईपीसीसी) ने बृहस्पतिवार को जलवायु परिवर्तन और भूमि संबंधी अपनी रिपोर्ट में कहा है कि दुनिया को घेर रही इस स्थायी प्राकृतिक आपदा से निपटने के लिए जीवाश्म-ईंधन से होने वाले कार्बन उत्सर्जन को रोकना ही काफी नहीं है। इसके लिए खेती में बदलाव करने होंगे, शाकाहार को बढ़ावा देना होगा और जमीन का इस्तेमाल सोच-समझकर करना होगा। विश्व में 23 फीसदी कृषियोग्य भूमि का क्षरण हो चुका है, जबकि भारत में यह हादसा 30 फीसदी भूमि के साथ हुआ है। जमीनों का रेगिस्तानीकरण जारी है। तकनीकी तौर पर मरुस्थल उस इलाके को कहते हैं, जहां पेड़ नहीं सिर्फ झाडिय़ां उगती हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण पैदावार में गिरावट आ रही है और खाद्य पदार्थों में पोषक तत्व कम होते जा रहे हैं। इससे खाद्य सुरक्षा बुरी तरह प्रभावित होगी। 
अनुमान है कि 2050 तक खाद्य वस्तुओं की कीमतें 23 प्रतिशत तक बढ़ जाएंगी। 25-30 प्रतिशत खाद्य पदार्थ अभी यूं ही बर्बाद हो जाते हैं। इस बर्बादी को कम करने से ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन कम होगा और खाद्य सुरक्षा में सुधार होगा। आईपीसीसी की रिपोर्ट का साफ इशारा यह है कि हमें अपनी जीवन-पद्धति बदलनी होगी। यह तभी संभव है जब हम यह मानने को तैयार हों कि जिसे हम विकास समझ रहे हैं वह एक मायने में विनाश है। हम जहां तक पहुंच चुके हैं वहां से एकाएक पीछे लौटना मुमकिन नहीं, पर विकास की दिशा बदली जा सकती है, उसकी रफ्तार घटाई जा सकती है। आईपीसीसी रिपोर्ट जो कह रही है, पहले वही बात दूसरी रिपोर्टों ने भी कही है। भूमि की बर्बादी को लेकर भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) की एक रिपोर्ट में भी भारत के कुल भूमि क्षेत्र का लगभग 30 फीसदी हिस्सा मरुस्थल बन जाने की बात दो साल पहले आ चुकी है। प्राकृतिक कारणों या मानवीय गतिविधियों के चलते जैविक उत्पादकता में कमी की स्थिति को भू-क्षरण कहा जाता है।
जिन इलाकों में यह भू-जल के खात्मे के चलते हो रहा है, वहां इसे मरुस्थलीकरण का नाम दिया गया है। लेकिन शहरों का दायरा बढऩे के साथ सड़क, पुल, कारखानों और रेलवे लाइनों के निर्माण से खेतिहर जमीन का खात्मा और बची जमीन की उर्वरा शक्ति कम होना भू-क्षरण का दूसरा रूप है, जिस पर अभी बात ही नहीं होती। वन क्षेत्र का लगातार खत्म होना भी इसकी एक बड़ी वजह है। अभी आईपीसीसी रिपोर्ट में आए सुझावों पर अमल शुरू किया जा सके तो थोड़ी राहत मिल सकती है। 
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