सर्वस्व त्याग करने वाले ऋषि दधीचि
कथा। प्राचीन काल में वृत्रासुर नाम का एक दैत्य बडा ही उन्मत्त हो गया था। अति बलवान होने के कारण देवताओं को उसे हराना कठिन हो गया, उसके विनाश के लिये भगवान विष्णु ने सुझाया कि दधीचि ऋषि की अस्थियों से बज्र बनायें, उससे वृत्रासुर का नाश हो सकता है। दधीचि ऋषि अति दयालु एवं सबकी सहायता करने वाले थे। इंद्रदेव दधीचि ऋषि के पास गए और इंद्रदेव ने कहा कि मैं आपके पास याचक बनकर आया हूं। दैत्य वृत्रासुर का नाश करने के लिए एक बज्र बनाना है। इसके लिए आपकी अस्थियां चाहिए। क्षण भर भी विचार न करते हुए दधीचि ऋषि ने कहा, ‘मैं प्राणत्याग कर अपनी देह ही आपको अर्पित करता हूं। फिर आप देह का जो चाहें कर सकते हैं। दधीचि ऋषि ने योगबल से प्राणत्याग किया। फिर उनकी देह की अस्थियों से षट्कोनी बज्र बनाकर इंद्रदेव को दिया गया। इसके बाद वृत्तासुर का अंत किया गया। हमारे ऋषि, मुनि इसलिये महान थे कि समाजहित में सर्वस्व त्याग देते थे। दधीचि की माता 'चित्ति' और पिता 'अथर्वा' थे, इसीलिए इनका नाम 'दधीचि' हुआ था। पुराण के अनुसार यह कर्दम ऋषि की कन्या 'शांति' के गर्भ से उत्पन्न अथर्वा के पुत्र थे। दधीचि प्राचीन काल के परम तपस्वी और ख्यातिप्राप्त महर्षि थे। महर्षि दधीचि ने तो अपनी देह देवताओ की भलाई के लिए त्याग दी, लेकिन जब उनकी पत्नी 'गभस्तिनी' वापस आश्रम में आई तो अपने पति की देह को देखकर विलाप करने लगी तथा सती होने की जिद करने लगी। तब देवताओ ने उन्हें बहुत मना किया, क्योंकि वह गर्भवती थी। देवताओं ने उन्हें अपने वंश के लिए सती न होने की सलाह दी। लेकिन गभस्तिनी नहीं मानी। तब सभी ने उन्हें अपने गर्भ को देवताओं को सौंपने का निवेदन किया। इस पर गभस्तिनी राजी हो गई और अपना गर्भ देवताओं को सौंपकर स्वयं सती हो गई। देवताओं ने गभस्तिनी के गर्भ को बचाने के लिए पीपल को उसका लालन-पालन करने का दायित्व सौंपा। कुछ समय बाद वह गर्भ पलकर शिशु हुआ तो पीपल द्वारा पालन पोषण करने के कारण उसका नाम 'पिप्पलाद' रखा गया। इसी कारण दधीचि के वंशज 'दाधीच' कहलाते हैं।

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