कांगे्रस मुक्त हो 'भारत', तभी होगी जय—जयकार

विचार : लोकसभा चुनाव 2019 हारने के बाद कांगे्रस पार्टी यानि 'पप्पू' पों—पों चिल्ला रहे हैं कि मैं अध्यक्ष पद पर नहीं रहूंगा। कांगे्रस में बड़ी असमंजस की स्थिति है, ऐसे ही जिस तरह कांगे्रस को समझ नहीं आ रहा कि राहुल गांधी स्वयं को कांगे्रस अध्यक्ष पर यथास्थिति बनाये रखेंगे या नये चेहरे को मौका देंगे, उसी तरह आज तक देश गांधी साथ ही में नेहरू परिवार के बारे में समझ नहीं पाया। कांगे्रस पार्टी के लोग बड़े ही बहरूपिये किस्म के हैं, इतनी सफाई से झूठ बोलते हैं कि एकदम पता चल जाता है कि भारतवर्ष की बेइज्जती कर रहे हैं। इसके बाद भी यह कांगे्रस वाले वोट पा जाते हैं, वह इसलिये है कि शायद हम भारतीय सांप को भी दूध पिलाते हैं और उनके जहर से ऐसी जीवनदायिनी औषधि बनाते हैं, जो बेहद कारगर होता है। वहीं अमेठी समेत कांगे्रस को लोकसभा चुनाव में हार का मुंह देखना पड़ा, तो इसकी जिम्मेदारी भोलेभाले कार्यकताओं के सिर प्रियंका ने मढ़ दिया। अरे, प्रियंका गांधी वाडरा कहीं की, कुछ तो जिम्मेदारी तुम मां, भाई और बहन भी ले लिया करो। वहीं लोकसभा चुनाव में शिकस्त के बाद कांग्रेस शासित राज्यों में अंतर्कलह के जो सुर तेज हो रहे हैं, उनका उभरना स्वाभाविक है। हरियाणा, पंजाब व राजस्थान में पार्टी संगठन व सरकार में जारी अंतर्कलह सामने है। आरोप-प्रत्यारोपों का सिलसिला जारी है। कांग्रेस कार्यसमिति की दिल्ली में बीते दिनों हुई बैठक में राजस्थान के मुख्यमंत्री के पुत्र-मोह पर सवाल उठने के बाद राजस्थान कांग्रेस में ​विरोध मुखर हो उठी और निशाने पर मुख्यमंत्री अशोक गहलोत आ गए। उन्होंने सचिन पायलट की जवाबदेही तय करने की बात कर दी। जाहिर है पराजय का ठीकरा एक-दूसरे के सिर फोडऩे की कवायद जारी है। उधर, हरियाणा में सभी दस सीटें भारतीय जनता पार्टी की झोली में चले जाने का मलाल भी अब अंतर्कलह के रूप में उभर रहा है। मंथन बैठक में प्रदेश अध्यक्ष डॉ. अशोक तंवर के इस्तीफे की मांग उठी, जिसके चलते हंगामेदार बैठक बेनतीजा रही। पंजाब की बात की जाये तो चुनाव के दिन मुख्यमंत्री कैप्टन अमरेंदर सिंह ने विवादित मंत्री नवजोत सिंह सिद्धू की महत्वाकांक्षा को उजागर करते हुए कह दिया कि वह मुख्यमंत्री बनना चाहते हैं। हालांकि यह टकराव पंजाब में लंबे समय से चला आ रहा है। वैसे भी राजनीति में कब प्यादे सिपहसालार बन जाएं, कहा नहीं जा सकता। सिद्धू अपने दुर्वचनों से कांगे्रस अध्यक्ष राहुल गांधी के मन को ठंडक भी तो पहुंचाता रहता है। नवजोत सिंह सिद्धू केंद्रीय नेतृत्व का वरदहस्त पाकर मजबूत स्थिति में मंत्रिमंडल में शामिल हुए थे। इसके अलावा कांग्रेस का राज्य नेतृत्व आरोप लगाता रहा है कि प्रियंका गांधी की रैलियों के अलावा राज्य में प्रचार से नवजोत सिंह सिद्धू कन्नी काटते रहे। गले में परेशानी बताते रहे। दरअसल, सिद्धू की राजनीतिक महत्वाकांक्षा तभी उजागर हो गई थी जब उन्होंने राज्य स्तर पर पार्टी की नीति से हटकर करतारपुर कॉरिडोर मामले में मुख्यमंत्री कैप्टन अमरेंदर सिंह से अलग लाइन ली। बाकायदा उन्होंने सार्वजनिक रूप से कैप्टन को नकारते हुए कहा था कि उनके कैप्टन तो राहुल गांधी हैं। जाहिर है राजनीति के पुराने खिलाड़ी कैप्टन को यह बयान नागवार गुजरा होगा। हालिया विवाद बढऩे पर कैप्टन सरकार के कई मंत्री खुलकर सिद्धू के विरोध में सामने आ गये। मोदी लहर के बावजूद पंजाब में कांग्रेस की जड़ें मजबूत करने वाले कैप्टन अमरेंदर को नाराज करना भी केंद्रीय नेतृत्व के लिये आसान नहीं है। ऐसे में यह टसल लगातार जारी रही है, जिसे हालिया आम चुनाव ने और बढ़ा दिया। यहां तक कि एक सीट पर हार का ठीकरा कैप्टन ने सिद्धू के सिर भी फोड़ा। फिलहाल यह तल्खी कम होती नजर नहीं आ रही है। दरअसल, कांग्रेस में सब अपनी—अपनी कमाई में लगे हुए हैं और भारत विरोधी भावनाएं उनमें खूब भरी हुई हैं, जिन्हें समाप्त किया जाना अति आवश्यक है। यह पुनीत कार्य जनता जनार्दन ही कर सकती है, बस इन्हें थोड़ा और दुलारने और जागरूक करना है। कांगे्रस मुक्ति के बाद ही भारत के 'परम वैभव' का मार्ग प्रशस्त होगा।













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