वृक्ष के स्वभाव के चलते मृग ने बदला नियम

बोधकथा : बोधिसत्व ने एक बार मृग योनि में जन्म लिया। उनका जीवन वन में विचरण करते और वन में उपजे फलों को खाकर गुजरता था। वन में वह एक वृक्ष विशेष के फल ही खाते थे जो उनको अति प्रिय थे। एक शिकारी वहां प्रतिदिन आता और फलदार वृक्षों पर मचान बांधकर बैठता था और वृक्ष के नीचे जो मृग फल खाने आते, उनका शिकार करके अपना जीवनयापन करता था। एक दिन उसने उस विशेष वृक्ष के नीचे बोधिसत्व के पदचिन्हों को देखा। शिकारी ने इसी मृग का शिकार करने की सोची और अगले दिन सुबह-सुबह उस वृक्ष पर मचान बना कर बैठ गया। इधर बोधिसत्व भी भूख लगने पर अपने प्रिय वृक्ष की ओर चले। उनकी अंतर्दृष्टि ने कुछ खतरे का आभास दिया तो वह वृक्ष से कुछ दूर खड़े हो गए ताकि किसी शिकारी आदि का खतरा न रहे। मृग को निकट न आते देख शिकारी ने ऊपर से ही उनके पास फल फेंकने प्रारम्भ कर दिए ताकि मृग फल खाते हुए वृक्ष के निकट आ जाए। बोधिसत्व समझ गए कि ऊपर अवश्य ही शिकारी बैठा है। वह बोल उठे-हे वृक्ष देवता, फलों का स्वभाव तो सीधे नीचे गिरना होता है। पर आज अपना स्वभाव छोड़कर इतनी दूर मेरे पास गिरा रहे हो। आपने अपना स्वभाव छोड़ दिया तो मैं भी अपना नियम छोड़ रहा हूं और आज से किसी और वृक्ष के नीचे अपना आहार खोजूंगा।

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