चरक संहिता का पालन
बोधकथा। वैद्य चरक संहिता का पालन कर भी रहे है या नहीं, इस बात का पता लगाने के लिए ऋषि चरक ने वेश बदलकर चरक संहिता के असली ज्ञान के बारे में पता लगाने के लिए नगर के एक प्रसिद्ध वैद्य के यहाँ पहुंचे, उस समय वैद्य रोगियों को देखने में व्यस्त थे। वैद्य का सहयोगी रोगियों द्वारा लाये गए सामान को लेकर रोगियों को वैद्य के पास बारी-बारी से भेज रहा था। जो रोगी कोई सामान नहीं लाता, उसे बाद में दिखाने के लिए बैठा दिया जाता। ऋषि चरक भी रोगी बनकर वैद्य के पास पहुंचे और उन्होंने वैद्य से पूछा निरोगी कौन हैं। तब वैद्य ने जवाब दिया निरोगी वह है, जो नियमित त्रिफला का सेवन करता है। यह त्रिफला हमारी वैद्यशाला में हमारी देखरेख में बनता है। ऋषि चरक को उसकी बात सुनकर बहुत ही निराशा हुई और वह बिना कुछ बोले वहां से निकल गए। उसके बाद वे नगर की दूसरी प्रसिद्ध वैद्यशाला में पहुंचे तो वहां की स्थिति भी बिलकुल पहले वाली वैद्यशाला जैसी ही थी। उन्होंने उस वैद्य से भी अपना वहीं प्रश्न दोहराया की निरोगी कौन हैं। इस वैद्य ने उत्तर दिया कि जो नियमित च्यवनप्राश का इस्तेमाल करता है। वह ही निरोगी हैं। इसके बाद ऋषि चरक ओर कई वैद्यशाला गये, लेकिन ऋषि चरक किसी से भी संतुष्ट नहीं हुए। इस प्रकार वे पूछते-पूछते नगर से बाहर पहुँच गए|वे सोचने लगे कि उन्होंने बेकार ही चरक संहिता को लिखा। वैद्यशालाएं को वैद्यों ने दुकानें बनाकर रख दिया है और अपने कर्तव्यों से विमुख हो गए हैं। यह सोचते-सोचते वह एक नदी के किनारे पहुँचे, वहां एक व्यक्ति नहा रहा था। जो देखने में वैद्य लग रहा था। ऋषि चरक ने उससे पूछा कि क्या आप वैद्य हैं। उस व्यक्ति ने जवाब दिया हाँ में वैद्य हूँ। तब ऋषि चरक ने उस व्यक्ति से सवाल पूछा,‘कोरुक‘? अर्थात निरोगी कौन है। उस व्यक्ति ने जवाब दिया,’हित भूक,मित भूक,ऋत भूक,’अर्थात जो व्यक्ति शरीर के लिए हितकारी भोजन ले, जो भूख से कम खाए और जो मौसम के अनुसार ही भोजन करे, वह व्यक्ति ही निरोगी रह सकता हैं। उस व्यक्ति का जवाब सुनकर ऋषि चरक प्रफुल्लित हो उठे और उसे गले लगा लिया। क्योंकि जिस जवाब को पाने के लिए वो भटक रहे थे वो अन्तोगत्वा मिल ही गया और उनका चरक संहिता लिखने का उद्देश्य भी पूरा हो गया।

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