ईर्ष्या का फल

सुविचार। ईर्ष्या का फल ईर्ष्या करने वाले को ही भोगना पड़ता है। ईर्ष्या मृत्यु का ही रूप है। जिस प्रकार मृत्यु मन को मूर्छित कर देती है, सगे-सम्बन्धियों की पहचान का ज्ञान नहीं रहने देती, वैसे ही ईर्ष्या भी मन को मूर्छित कर देती है। जो ईर्ष्या रूपी रोग में फंसे रहते हैं वह अपने जीवन और आयु का हृास करते रहते हैं। उनकी विचारशक्ति नष्ट हो जाती है। मन का कार्य है विचार करना, विवेक द्वारा हिताहित और भले-बुरे की परख करना, आत्मबोध करना। जिस मन में ईर्ष्या में आसन लगा लिया है, उसे और क्या सूझेगा। ईर्ष्या के कारण उस विवेक बुद्धि का नाश हो जायेगा, जिसके कारण मनुष्य, मनुष्य कहलाता है। जब मनुष्य तत्व का आधार ही लुप्त हो गया, तब उसके मरने में संदेह ही क्या रहा। ईर्ष्या एक ऐसा शब्द है जो मानव के खुद के जीवन को तो तहस-नहस करता है औरों के जीवन में भी खलबली मचाता है। यदि आप किसी को सुख या खुशी नहीं दे सकते तो कम से कम दूसरों के सुख और खुशी देखकर जलिए मत। ईर्ष्यावश दूसरों पर क्रोध करते समय मन जिह्वा तथा मुख मलिन होते हैं।

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