समर्पण का सम्मान
प्रेरक कथा : एक बार की बात है, एक राजा अपने महल में भोजन कर रहा था, तो अचानक खाना परोस रहे सेवक के हाथ से गिरकर थोड़ी सी सब्जी राजा के कपड़ों पर छलक गई। इससे कपड़ा तो खराब हुआ ही गुस्सैल राजा की त्यौरियां चढ़ गयीं। सेवक ने उसकी मुखमुद्रा देखी तो बहुत घबरा गया, लेकिन शीघ्र ही उसने खुद को संभाला और कुछ सोच समझ कर अपने प्याले की बची सारी सब्जी भी राजा के कपड़ों पर उड़ेल दी। अब तो राजा अति क्रोधित हुआ, राजा ने गुस्से में सेवक से पूछा, 'यह क्या बदतमीजी है? तुमने ऐसा करने का दुस्साहस कैसे किया? सेवक ने शांत भाव से उत्तर दिया—महाराज! आपका गुस्सा बढ़ता देखकर मैंने पहले ही समझ लिया था कि अब मेरी जान नहीं बचेगी। लेकिन फिर मैंने सोचा कि ऐसा हुआ तो लोग कहेंगे कि राजा ने छोटी-सी गलती पर एक समर्पित सेवक को मौत की सजा दे दी। लोग ऐसा कहते तो स्वाभाविक ही आपकी बदनामी होती। इसलिए मैंने सोचा कि सारी सब्जी ही आप पर उड़ेल दूं। ताकि दुनिया आपको बदनाम न करे और मुझे ही अपराधी समझे। राजा को सेवक के जबाव में एक गंभीर संदेश के दर्शन हुए और पता चल गया कि सेवक भाव कितना कठिन है। जो समर्पित भाव से सेवा करता है, उससे कभी गलती भी हो सकती है। फिर चाहे वह सेवक हो, मित्र हो, या परिवार का कोई सदस्य। ऐसे समर्पित लोगों की गलतियों पर नाराज न होकर उनके प्रेम व समर्पण का सम्मान करना चाहिए, यही तो है समर्पण भाव।

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