राजा पृथु की वजह से खूब अपमानित हुआ लुटेरा बख्तियार खिलजी
"बख्तियार खिलज़ी तू ज्ञान के मंदिर नालंदा को जलाकर कामरूप (असम) की धरती पर आया है, अगर तू और तेरा एक भी सिपाही ब्रह्मपुत्र को पार कर सका तो मां चंडी (कामातेश्वरी) की सौगंध मैं जीते-जी अग्नि समाधि ले लूंगा : राजा पृथु"
कथा। आजादी के बाद इतिहास में बख्तियार खिलजी का नाम दूसरे प्रसंगों में प्रमुखता से लिया जाता है, लेकिन राज पृथु का जिक्र कम देखने व सुनने को मिलता है। यह भी विडम्बना है कि इतिहासकारों ने पृथ्वीराज को हीरो बना दिया, जिसे मोहम्मद गोरी ने हराया था, लेकिन राजा पृथु का भारतीय इतिहास में कोई नाम नहीं जिसने गोरी सेना को खदेड़ा था। मालूम हो कि इस समय भारत सरकार आजादी का अमृत महोत्सव मना रही है। जिसका उद्देश्य ऐसे स्वतंत्रता सेनानियों के नाम सामने लाना है, जिसे इतिहास में भुला दिया गया, जिनका कोई जिक्र नहीं। इसी संदर्भ में यह भी है कि राजा पृथु की तरह एक दो नहीं, सैकड़ों नाम हैं जिन्हें आज भारत के इतिहास में सम्मान के साथ दर्ज होने चाहिए थे लेकिन पृथु का नाम असम से बाहर शायद ही किसी को मालूम हो। 1206 ई. में मोहम्मद बिन बख्तियार खिलजी ने बौद्ध मठों के खजाने को लूटने और दक्षिण पूर्व एशिया के साथ बंगाल के पारम्परिक व्यापार मार्ग पर कब्जा जमाने के लिए तिब्बत पर आक्रमण करने की योजना बनाई, जिसके लिए उन्हें कामरूप और सिक्किम के राज्य से गुजरना पड़ा। बख्तियार की 12 हजार घुड़सवारों को पृथु की सेना ने गाजर मूली की तरह काट डाला और बचे सिर्फ 100 लोग। तिब्बत को जीतने के लिए बख्तियार खिलजी का अभियान एक निरंतर आपदा थी और उसकी वापसी के बाद जल्द ही मौत हो गयी। 27 मार्च 1206 को असम की धरती पर एक ऐसी लड़ाई लड़ी गई जो मानव अस्मिता के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित है। एक ऐसी लड़ाई जिसमें फौजी तो लड़ने आए तो 12 हजार और जिन्दा बचे सिर्फ 100। जिन लोगों ने युद्धों के इतिहास को पढ़ा है वह जानते हैं कि जब कोई दो फौज़ लड़ती है तो कोई एक फौज या तो बीच में ही हार मान लेती है या समर्पण करती है, लेकिन 12 हज़ार लड़े और बचे सिर्फ 100 वह भी घायल। आज भी गुवाहाटी के पास वह शिलालेख मौजूद हैं, जिस पर इस लड़ाई के बारे में लिखा है। मोहम्मद बख्तियार खिलजी बिहार बंगाल के कई राजाओं को जीतते हुए असम की तरफ बढ़ रहा था। उसने नालंदा विश्वविद्यालय को जला दिया था और हजारों बौद्ध, जैन और हिन्दू विद्वानों को मार डाला। नालंदा विश्वविद्यालय में विश्व की अनमोल पुस्तकें, पाण्डुलिपियाँ, अभिलेख आदि जलकर राख हो गये थे। बख्तियार खिलज़ी मूलतः अफगानिस्तान का रहने वला था और मोहम्मद गोरी व कुतुबुद्दीन ऐबक का रिश्तेदार था। खिलज़ी नालंदा को खाक में मिलाकर असम के रास्ते तिब्बत जाना चाहता था। तिब्बत उस वक्त चीन, मंगोलिया, भारत, अरब व सुदूर पूर्व के देशों के बीच व्यापार का एक महत्वपूर्ण केंद्र था तो खिलज़ी इस पर कब्जा जमाना चाहता था, लेकिन उसका रास्ता रोके खड़े थे असम के राजा पृथु, जिन्हें राजा बरथू भी कहा जाता था। गुवाहाटी के पास दोनों के बीच भीषण युद्ध हुआ। राजा पृथु ने सौगन्ध खाई कि किसी भी सूरत में वो खिलजी को ब्रह्मपुत्र नदी पार कर तिब्बत की और नहीं जाने देंगे, उन्होंने व उनके आदिवासी योद्धाओं नें जहर बुझे तीरों, खुकरी, बरछी और छोटी लेकिन घातक तलवारों से खिलजी की सेना को बुरी तरह से काटा। खिलजी खुद और कई सिपाही जंगल में भागे, पहाड़ों में भागे लेकिन असम वाले तो जन्मजात योद्धा थे, आज भी दुनिया में उनसे बचकर कोई नहीं भाग सकता। उन्होंने उन भगोड़ों खिलजियों को अपने पतले लेकिन जहरीले तीरों से बेध डाला। अन्त में खिलजी महज अपने 100 सैनिकों को बचाकर जमीन पर घुटनों के बल बैठकर क्षमा याचना करने लगा। राजा पृथु ने तब उसके सैनिकों को अपने पास बंदी बना लिया और खिलजी को अकेले जिन्दा छोड़ दिया, उसे घोड़े पर लादा और कहा कि "तू वापस अफगानिस्तान लौट जा, रास्ते में जो भी मिले उसे कहना कि तूने नालंदा को जलाया था फिर तुझे राजा पृथु मिल गया, बस इतना ही कहना लोगों से। खिलजी रास्ते भर इतना बेइज्जत हुआ कि जब वो वापस अपने ठिकाने पंहुचा तो उसकी दास्ताँ सुनकर उसके ही भतीजे अली मर्दान ने उसका सिर काट दिया। यह चिंतनीय है कि बख्तियार खिलजी के नाम पर बिहार में एक कस्बे का नाम बख्तियारपुर है और वहां रेलवे जंक्शन भी है, जबकि राजा पृथु के नाम के शिलालेख को भी ढूंढना पड़ता है।

टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें