सद्ज्ञान की उपल​ब्धि ही मनुष्य जीवन का श्रेष्ठ सौभाग्य है

विचार। आत्मा, मन और शरीर, मानवीय व्यक्तित्व के तीन आयाम होते हैं। अन्न, जल व वायु न मिले तो शरीर अधिक समय तक जीवित न रहेगा। मन को पोषण देने के लिये सद्विचारों की व सद्भावनाओं की आवश्यकता पड़ती है। वहीं आत्मा की पूर्ति सद्ज्ञान से होती है। सद्ज्ञान यानि मानव का गुण, कर्म और स्वभाव की उत्कृष्टता से आत्मा को पोषण मिलता है। मनुष्य के जीवन में अकल्पनीय सुख-सुविधाओं के अम्बार लगा दिये जायें और इन सबके बावजूद सद्ज्ञान नहीं है तो यह खालीपन व्यक्ति को जरूर पूरा करना चाहिए यानि कि सद्ज्ञान का होना परम आवश्यक है। सद्ज्ञान की उपल​ब्धि ही मनुष्य जीवन का श्रेष्ठतम सौभाग्य है। सद्ज्ञान की प्राप्ति के बाद मनुष्य को संतोष, सम्मान और समुन्नति मिलता है, जिसके आगे स्वर्ग की सम्पदा भी नगण्य नजर आती है। सद्ज्ञान की प्राप्ति के लिये रास्ते अनेक हैं, लेकिन स्वाध्याय और सत्संग का मार्ग अपनाने वाले लोग महानता के अधिकारी बनते हैं। कहते हैं कि सद्ज्ञान पारस के पत्थर के समान है, जिसके छूने मात्र से जीवन स्वर्णिम व सौभाग्यशाली बनता है, जिसे सद्ज्ञान न मिल सका, वह जन्म-जन्मांतरों तक पतन व पराभव की वीथियों में भटकता रहता है, जबकि सद्ज्ञान प्राप्त कर लेने वाले अपने जीवन को एक प्रेरणा में परिवर्तित कर देते हैं। 

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