बारिश को धन्यवाद

बोधकथा : एक धनाड्य अपने संघर्ष के दिनों में शहर से कुछ कमा कर अपने गांव वापस लौट रहे थे। अपना सामान उन्होंने घोड़े पर बांध रखा था और स्वयं पैदल उसकी लगाम थामे चल रहे थे। अभी वह आधे रास्ते में ही थे कि मूसलाधार बरसात शुरू हो गई। वह स्वयं तो भीग ही रहे थे, उनका सारा सामान भी भीग कर गल गया। वह अपना सिर ऊपर कर ईश्वर को कोसते जा रहे थे और मन ही मन अपने नुकसान का आकलन करते जा रहे थे। दुर्भाग्य से तभी झाडिय़ों से निकलकर एक दुर्दांत डाकू उनके सामने आ खड़ा हुआ और अपनी बंदूक धनाड्य पर तान दी। धनाड्य व्यक्ति ने अपने ईश्वर को याद किया और अपना सामान डाकू को सौंपने से इनकार कर दिया। डाकू ने चेतावनी देते हुए उन पर गोली चला दी मगर भारी बरसात के चलते बंदूक के कारतूस भी भीग कर बेकार हो गए थे। धनाड्य भी मौका ताड़कर डाकू से भिड़ गया और थोड़े संघर्ष के पश्चात उसे परास्त कर दिया। उस धनाड्य व्यक्ति ने बरसात के लिए ईश्वर को धन्यवाद दिया और अपने जानमाल के साथ सुरक्षित घर पहुंच गया।

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