राजनीति, न्यायालय और समाज में सक्रिय हैं देशविरोधी सोच रखने वाले लोग

विचार : मसूद अजहर के वैश्विक आतंकी घोषित होने के बाद भारत में आतंकीपरस्त नेताओं और लोगों को अच्छा नहीं लग रहा है। आतंकवाद का साथ देने वाले नेताओं को खाद, पानी देने का काम आखिर कौन कर रहा है तो यह कहा जा सकता है कि भारत की कुछ ऐसी जनता है जो भारत को खंड—खंड और टुकड़ों में देखना चाह रही है, वही लोग ऐसे नेताओं को आगे बढ़ाते हैं, संसद में भेजते हैं कि वहां जाकर हमारी बात रखी जाये, और ऐसे नेता संसद पटल पर ऐसे विभाजनकारी और विघटनकारी बातें रखते हैं और वाहवाही भी लूटते हैं। दूसरी ओर देशभक्त, राष्ट्रवादी विचारधारा के लोग अथक प्रयास और संघर्ष से भारत का वैभव बनाने में कोई कोर, कसर नहीं छोड़ना चाहते। यही कारण है कि आज भले ही देश में ऐसे देशभक्त नेताओं को तवज्जो न मिले, लेकिन विदेशों में ऐसे नेताओं को पलकों पर ​बैठाया जाता है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण है आतंकवादी मसूद अजहर को वै​श्विक आतंकवादी घोषित करवाना। आतंकवादी संगठन जैश-ए-मोहम्मद के सरगना और पुलवामा हमले के मास्टरमाइंड मसूद अजहर को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने ग्लोबल टेररिस्ट्स की अपनी सूची में भारत के अथक प्रयासों के बाद शामिल कर लिया। निश्चित रूप से यह भारतीय कूटनीति की बहुत बड़ी जीत है। पुलवामा हमले के ठीक बाद मार्च में की गई यह पहल पिछले अनेक प्रयासों की तरह चीन के वीटो की वजह से नाकाम हो गई थी। मगर भारत ने उसके बाद भी कोशिशें जारी रखीं। आतंकवाद पर अंकुश लगाने के इन प्रयत्नों में अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन समेत कई देशों का खुला साथ मिला। परदे के पीछे चली तेज कूटनीतिक गतिविधियों से चीन को अंदाजा हो गया कि पाकिस्तान से दोस्ती निभाने के नाम पर आतंकवाद को संरक्षण देने वाली महाशक्ति की छवि बनना उसके लिए अच्छा नहीं होगा। उसकी जो भी शंकाएं थीं उन्हें दूर करने में भी बाकी देशों ने सक्रिय भूमिका निभाई। नतीजा यह रहा कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के मंच पर मसूद अजहर का बचाव करने या इस मसले को टालते जाने वाला कोई नहीं रह गया। याद करें तो मुंबई हमले की साजिश रचने के मुख्य आरोपी हाफिज सईद का नाम वैश्विक आतंकियों की इस सूची में पहले से ही शामिल है। 26 नवंबर 2008 को मुंबई पर हुए आतंकी हमले के तुरंत बाद 10 दिसंबर 2008 को उसे इस सूची में डाल दिया गया था। दोनों मामलों में एक बड़ा फर्क यह है कि हाफिज का कश्मीर से लेना-देना नहीं था, जबकि मसूद अजहर इस लिस्ट में डाला जाने वाला वह पहला आतंकी है, जिसकी पहचान जम्मू-कश्मीर की आतंकी गतिविधियों से जुड़ी है। इससे यह साबित होता है कि दुनिया भारत की राय को तवज्जो देते हुए कश्मीर मसले को आतंकवाद से जुड़ी समस्या के रूप में देखने लगी है। मामले का दूसरा पहलू यह है कि अमेरिका का हाथ अपने सिर से हटने के बाद पाकिस्तान ने अगर चीन के बल पर दक्षिण एशिया में अपनी हरकतें जारी रखने का मन बना रखा था तो उसकी यह योजना अजहर मसूद के साथ ही रसातल में जा चुकी है। आज की तारीख में भारत का सबसे बड़ा बिजनेस पार्टनर चीन है। ऐसे में भारतीय हितों की ज्यादा समय तक अनदेखी करने का जोखिम वह नहीं ले सकता। यह बात किसी से छिपी नहीं आतंकी हाफिज आतंकवाद अब लोकतंत्र में भी फैलाना चाह रहा है। 11 वर्षों से ग्लोबल आतंकी घोषित हाफिज सईद आज भी पाकिस्तानी राजनीति का एक खास नाम है। लेकिन यह तो है कि ये दोनों पाकिस्तानी आतंकी अब संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देशों की यात्रा नहीं कर सकते। उनके बैंक खातों से बेधड़क लेन-देन भी अब नहीं हो सकता। उनपर तेज नजर रखना सरकारी मशीनरी के लिए लाजमी है। कुल मिलाकर देखें तो भारत में लाखों रुपये का आरडीएक्स भेजना उनके लिए पहले जितना आसान नहीं होगा। वहीं देश में आतंकवादियों से सहानुभूति रखने वालों की बात की जाये तो ऐसे लोगों में राजनेताओं से लेकर न्यायाधीश तक शामिल हैं। जम्मू—कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती कह रही हैं कि रमजान के दौरान आतंकियों पर सरकार सख्ती न करे, सवाल उठता है कि क्यों न करे, देश को नुकसान पहुंचाने वाले, देश को खंडित करने वालों पर कार्रवाई क्यों न की जाये, अरे होना तो यह चाहिए कि ऐसी सोच रखने वालों को सरेराह सजा देनी चाहिए, जो भी आये वह चार पत्थर मारे और...। देश में न्यायाधीश भी ऐसे हैं, जिन पर महिलाएं यौन उत्पीड़न का आरोप लगा रही हैं और वह हैं कि सरकार के प्रत्येक कार्य, योजनाओं पर बारीकी से नजर रख रहे हैं कि कहीं मोदी सरकार देशहित में तो नहीं फैसले कर रही है। मोदी सरकार के ऐसे कई कार्यों पर टीका, टिप्पणी शीर्ष अदालत द्वारा की जा रही है, जो उसको सही मायनों में नहीं करना चाहिए और सभी संस्थाओं को यह स्वीकार करना चाहिए कि शीर्ष पर शासन व्यवस्था ही है। शीर्ष अदालत ने एक मामले में यह भी चुनाव आयोग से पूछा है कि क्या रमजान में मतदान के समय में परिवर्तन हो सकता है, तब सवाल उठता है कि मामला तो यह भी धार्मिक हुआ न, चुनाव के समय ऐसे धार्मिक मामलों को उठाना कहां तक तर्कसंगत है। जब देश में धारा 144 लागू है तो ऐेसे मसलों को या तो चुनाव से पहले हल कर लें या फिर चुनाव बाद। देश के शीर्ष न्यायालय को रमजान की चिंता है, लेकिन राम मंदिर पर सुनवाई के लिए उसके पास पांच मिनट का समय भी नहीं। ऐसे  देखा जाये तो हिंदुओं के लिए प्रतिदिन कुछ न कुछ त्योहार या पर्व, व्रत रहता ही है तो क्या हिंदू लोग सारे कार्य व्रत या पर्व के बाद करते हैं। इसका मतलब है कि विभाजनकारी शक्तियां अभी भी समाज में पूरी ताकत के साथ विद्यमान है और पूरी कोशिश है कि भारत से सनातन धर्म समाप्त किया जाये, इसी के तहत ईसाई और इस्लामिक मिशनरियां देश में सक्रिय हैं। देश​विरोधी सोच रखने वालों के खिलाफ जब तक भारतीया समाज यानि हिंदू समाज डंटकर खड़ा नहीं होगा तब तक सुकून की जिंदगी भारतवासियों के नसीब में नहीं है, इतना तय है।

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