जीवन में 'ध्यान' जरूरी
विचार: किसी भी व्यक्ति का जब जन्म होता है तो उसे शुरू से ही जीवन में सावधान रहने की हिदायत दी जाती है, ध्यान से देखों, ध्यान से पढ़ों, ध्यान देकर चलो आदि बातें बड़ी तत्पराता से सिखायी जाती है, जो कि जरूरी भी है। जीवन में ध्यान न हो तो पागलपन स्वाभाविक है। जीवन की दो ही दिशायें सम्भव हैं-ध्यान अथवा पागलपन। जो ध्यान में नहीं रहते वह स्वयं ही पागलपन की अवस्था में पहुंच जाते हैं। वे पागल जो पागलखानों में हैं और वे जो बाहर हैं, इनमें अंतर केवल मात्रा का है। हां यह सम्भव है कि कि बाहर के लोग थोड़ा कम पागल हों और जो पागलखानों में वह थोड़ा अधिक। पागलपन का तात्पर्य है कि केंद्रित न होना। व्यक्ति अपने अंतर्मन में एक न होकर भीड़ में भटका हुआ है। मन में गृहयुद्ध जैसी स्थिति बनी रहती है। यदि यही गृहयुद्ध मन में न हो तो ध्यान में आसानी से उतरा जा सकता है और जीवन को सार्थक बनाया जा सकता है। इस बात को परखने के लिये सिर्फ कुछ पलों के लिये मन आने वाली बातों को ईमानदारी से लिखा जाये और उसे पढ़ा जाये तो प्रतीत होगा कि आजकल व्यक्ति निरी विक्षिप्तता के अलावा कुछ भी नहीं है। मन या चित्त की अनंत गुहाओं में संस्कारों का आवागमन लगातार चलता रहता है। एक ओर से नये कर्मबीज आते हैं और दूसरी ओर से परिपाक हुए कर्मबीज जीवन की सतह पर आकर प्रभाव छोड़ते हुये नष्ट हो जाते हैं। हम लोगों का वर्तमान संस्कारबीज के दोनों सिराओं से बंधा हुआ है। वर्तमान के कर्म व्यापार से प्रारब्ध कटता है और भविष्य गढ़ा जाता है। संस्कारबीज की फसल बढ़ती है, लहराती है, विकसित होती है, अत्यंत आकर्षक व लुभावनी भी लगती है, परंतु तभी तक, जब तक जीवन उर्जा से सिंचित होती है। जीवन उर्जा के चुक जाने पर सब कुछ उलट जाता है। आत्मसत्ता का साम्राज्य चहुं ओर से निराशा, घुटन, कुंठा, उद्वेग, शोक संताप आदि क्लेशों से घिर जाता है। जीवन बड़ा भयावह हो जाता है। व्यक्ति एक पल के लिये यह नहीं सोच पाता कि जीवन की दुर्गति का कारण भीतर है और इसका उपाय भी व्यक्ति के अंदर ही है। कहने का मतलब यह नहीं कि ध्यान से ही सारे दुख दूर हो जायेंगे, लेकिन यह सत्य है कि जीवन में ध्यान रहे तो दुख करीब नहीं आ पायेगा।

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