एकता का महत्व

बोधकथा : एक दिन इंद्रियों में इस बात को लेकर ठन गई कि कौन ज्यादा महत्वपूर्ण है। मस्तिष्क ने सबसे पहले बोलना शुरू किया और कहा कि यदि मस्तिष्क काम न करे तो मनुष्य पशु के समान हो जाएगा, उसकी बात बीच में काटते हुए हृदय बोला कि यदि हृदय धड़कना बंद कर दे तो पशु होना भी किसी काम का नहीं। हाथ—पैर कहां पीछे रहने वाले थे, वे उसी व्यग्रता के साथ बोले कि हाथ—पैर न हों तो धड़कते हृदय और चलते मस्तिष्क का रहना एकदम व्यर्थ है। एक स्थान पर बैठे रहें, लेकिन कार्य कोई न कर पाएं, ऐसा जीवन भी कोई जीवन है। वाद—विवाद का कोई परिणाम न निकलता देख विधाता के यहां गोष्ठी का आयोजन किया गया। सभी अंग एवं इंद्रियां अपने—अपने पक्ष की बातें लेकर वहां पहुंचे और उनको प्रस्तुत करने के बाद विधाता की ओर आशा भरी निगाहों से देखने लगे। विधाता मुस्कुराए और बोले कि तुम्हारे प्रश्नों के उत्तर तो तुम्हें तुम्हारी बहस में ही मिल गया था। अंग एवं इंद्रियां यह सुनकर आश्चर्य से बोले—ऐसा कब हुआ था प्रभु, विधाता ने कहा— जब तुम सभी अपने अपने पक्ष रख रहे थे तो ये नहीं समझे कि तुम में से एक के बिना भी शरीर का उपयोग क्या है! तुम सब के साथ रहने पर ही तो वह उपयोगी है, एकांगी तो वह किसी काम का नहीं। सबकी समझ में आ गया कि महत्व एकता से है, व्यर्थ के एकांगी अहंकार से नहीं। 

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