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पोस्ते की फसल से तैयार होता है अफीम, हेरोइन व मार्फीन

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विचार। देश में पोस्ते की फसल उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान में मुख्यत: बोई जाती है। पोस्त की खेती व व्यापार के लिये सरकार के आबकारी विभाग से अनुमति लेना जरूरी है। पोस्ते के पौधे से अहिफेन यानि अफीम निकलती है, जो नशीली होती है। आयुर्वेद में दस्त बन्द करने वाली सभी दवाओं में अफीम का मिश्रण होता है। कर्पूर रस अहिफेन युक्त अफीम से बनने वाली दवा है। सेक्स के कुछ उत्पाद भी अफीम युक्त होते हैं, लेकिन इनसे तत्कालिक लाभ ही मिलता है। हेरोइन में मार्फिन भी होता है, जो मेडिकल क्षेत्र में पेनकिलर दवा के रूप में काम में लिया जाता है। अफीम और एसिटिक मिलाकर हेरोइन तैयार की जाती है। इसका केमिकल फार्मूला है डाई एसिटिल। हेरोइन शारीरिक और मानसिक क्षमता को कम कर देती है। भारत में अफीम की पैदावार का प्रयोग दूसरे देशों में होने वाले व्यापार के लिए जमकर किया जाता था। अंग्रेजों ने अपने फायदे के लिए नशे की खेती कराई और अफीम के जरिए अपनी एकाधिकार कायम किया। मौजूदा दौर में भारत सरकार अपनी अफीम नीति के तहत लाइसेंस देती है। इसके लिए लाइसेंस के लिए कोई आवेदन नहीं करना पड़ता है बल्कि पहले से मौजूद रिकॉर्ड के ...

तीन राशियों के लिये बेहद शुभ है बुधादित्य योग

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ज्योतिष। शास्त्र के अनुसार 21 नवंबर 2021 से बुधादित्‍य योग बन रहा है, जो कि 20 दिनों तक रहेगा। बुधादित्‍य योग 3 राशियों के जातकों के लिए बेहद शुभ है। जबकि तीन राशियों के लिये आंशिक फलदायी है। सफलता, स्‍वास्‍थ्‍य, आत्‍मविश्‍वास के कारक ग्रह सूर्य और बुद्धिमत्‍ता, धन के कारक ग्रह बुध शीघ्र ही युति बनाने जा रहे है। बुध ग्रह सूर्य के सबसे निकट है और इसीलिए उसका पुरुषत्व समाप्त हो गया, लेकिन बुध भी अपना प्रभाव अन्य ग्रहों के सान्निध्य की अपेक्षा सूर्य के साथ होने पर विशेष लाभ प्रदान करता है। जन्मांग चक्र में प्राय: 70 प्रतिशत संभावना सूर्य, बुध के एक साथ बने रहने की ही होती है। बुधादित्य नाम से विख्यात यह योग अलग-अलग भावों में अतिविशिष्ट फल प्रदान करने वाला होता है। ज्योतिष में सूर्य ग्रह को आत्मा, पिता, सम्मान, आदि का कारक माना गया है वहीं, बुध को ज्ञान, बुद्धि, व्यापार का कारक ग्रह माना जाता है। ऐसे में जब ये दोनों ग्रह मिलते हैं तो बुधादित्य योग का निर्माण होता है। बुधादित्य योग जब वृष, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु, कुंभ लग्न में हो तो व्यक्ति प्रभावशाली होता है। यह योग 10 दिसम्बर तक रहेगा...

देश का गौरव बढ़ा रही हैं आत्मनिर्भर महिलायें

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विचार। चाहे खेल हो या अंतरिक्ष विज्ञान, देश की महिलाएं किसी भी क्षेत्र में पीछे नहीं हैं। वह कदम से कदम मिला करआगे बढ़ रही हैं और अपनी उपलब्धियों से देश का नाम गौरवान्वित कर रही हैं। महिला वह शक्ति है, सशक्त है, वो भारत की नारी है, न ज्यादा में, न कम में, वह सब में बराबर की अधिकारी है। केंद्र सरकार की कई योजनाएं केवल महिलाओं के लिए हैं। मोदी सरकार ने महिला सशक्तिकरण की दिशा में कई कदम उठाए हैं। जिसका लाभ बड़े पैमाने पर देश की महिलाओं को मिल रहा है। सरकार का उद्देश्य है कि महिलाएं भी पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर आगे बढ़ें। वैसे भी हर क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी बढ़ती जा रही है। सुकन्या समृद्धि योजना प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना, बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ योजना, सुरक्षित मातृत्व आश्वासन सुमन योजना, फ्री सिलाई मशीन योजना, महिला शक्ति केंद्र जैसी योजनायें महिलाओं को सशक्त करने के लिये ही है। कुछ साल पहले तक घरेलू व्यवसाय के क्षेत्र में महिलाएं ब्यूटी पार्लर और पापड़-अचार बनाने तक सीमित थीं, लेकिन अब उन्होंने शिल्प से लेकर वनोपज उत्पादों के निर्माण जैसे कई क्षेत्रों में कदम बढ़ाए हैं। ...

जनजातीय क्राफ्ट मेले ने लोगों का मन मोहा, अद्भुत कला प्रदर्शनी

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विचार। मानव सभ्यता की जड़ आदिवासी ही हैं, यह कहना कतई गलत नहीं है। मानव सभ्यता नदियों के किनारे जंगलों में ही शुरू हुई। छत्तीसगढ़ का बस्तर जिला वनों से ढका हुआ है। यह भारत में उपस्थित जनजातियों  समुदाय का बड़ा हिस्सा यहाँ निवासरत है। बस्तर शिल्प की दीवार दुनिया भर में कला उत्साही और कला के जानकारों का ध्यान आकर्षित करते हैं। बस्तर कलाकृतियों आमतौर पर जनजातीय समुदाय की ग्रामीण जीवनशैली को दर्शाती है। छत्तीसगढ़ कला और संस्कृति के लिहाज से समृद्ध है, इसमें भी खासतौर पर आदिवासियों की हस्तकला और शिल्प के लिए लोगों की दीवानगी देखते ही बनती है। छत्तीसगढ़ जनजातीय क्राफ्ट मेला के तीसरे दिन बड़ी संख्या में लोग जनजातीय क्राफ्ट मेला में पहुंचे और अपने पसंद की वस्तुओं की खरीदी की। इस दौरान गोदना और ढोकरा शिल्प, बांस कला जैसी पुरानी कलाओं को नए अंदाज में देखकर युवा खासा उत्साहित नजर आए। छत्तीसगढ़ शासन के आदिम जाति कल्याण विभाग एवं जनजातीय कार्य मंत्रालय नई दिल्ली के सहयोग से आयोजित छत्तीसगढ़ जनजातीय क्राफ्ट मेले में इस बार नयापन देखने को मिला। बेलमेटल, बांस और ढोकरा शिल्प के माध्यम से डेकोरेटिव...

खुद के लिये नहीं किया जाता विद्या का प्रयोग

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बोधकथा। एक गांव मे एक व्यक्ति पशु, पक्षियों का व्यापार किया करता था। उसे मालूम हुआ कि उसके गुरू को पशु, पक्षियों की बोली लगाने की अच्छी विद्या आती है, वह पहुंच गया गुरु के पास और जाते ही गुरु की सेवा करने लगा तो उसने कहा कि मुझे पशु, पक्षियों के व्यापार करने की विद्या बता दो, जिससे मुझे अच्छा मुनाफा हो सके। गुरु ने कहा—ठीक है, लेकिन एक बात ध्यान रखना कि कभी भी इस विद्या का प्रयोग अपने फायदे के लिए मत करना, व्यापारी ने कहा—ठीक है गुरु जी। व्यापारी जैसे ही घर पहुंचा कबूतर उससे कहता है कि दो दिन बाद बैल मरने वाले हैं, वह सुनते ही बैलों को बेच देता है। उसे अच्छा मुनाफा होता है। दूसरे दिन एक चिड़िया कहती है कि मुर्गियां मरने वाली हैं, उसने सारी मुर्गियां अच्छे दामों पर बेच दी। एक बार बिल्ली ने कहा कि तुम मरने वाले हो, तो व्यापारी परेशान हो जाता है और गुरु के पास जाता है और कहता है कि मै मरने वाला हूं। इस पर गुरु कहते हैं कि मैंने पहले कहा था कि इस विद्या का प्रयोग कभी खुद की भलाई के लिए मत करना। खुद के मुनाफे के लिए कभी मत करना। विद्या की हमेशा एक खासियत होती है, उसे कभी अपने लिए नहीं प्रयो...

शारीरिक परिश्रम से नहीं डरते कर्मठ किसान

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विचार। दो बैलों की जोड़ी से जुताई का कोई मुकाबला नहीं है। आज भी देश के कई जगहों पर दो बैलों की जोड़ी और हल-जोठ-सरावन की हनक बरकरार है। अधिकतर जगहों पर आज भी बैलकोल्हू चलता है, अच्छे-अच्छे कोल्हुआर बैलों के सहारे उद्यम कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में अक्सर ठंडी के दिनों में बैलगाड़ी से कोल्हुआर से बना गुड़ व चीनी बेंचते हैं, जो स्वाद में निहायत बेमिसाल रहता है। स्वास्थ्य के लिहाज से भी काफी बेहतर रहता है। देश के कई किसान ट्रैक्टर की जोताई की बजाय बैलों की जोड़ी से जोताई करना बेहतर समझते हैं। एक समय वह था जब हर खेतिहर किसान ही नहीं बल्कि खेतिहर मजदूर भी एक जोड़ी बैल जरूर रखता था। वर्ष में एक बार उनकी ही नहीं बल्कि हल-जोठ की भी पूजा होती थी। देशी हल की जोताई से खेत में जगह नहीं छूटती थी। खेत ऊंचा-नीचा नहीं होता था जबकि ट्रैक्टर की जोताई करने पर खेत ऊंचा हो जाता है। फसल बोने पर बीच में लाइन बन जाती है और बीज की बरबादी होती है। खेत के कोन किनारे ट्रैक्टर से नहीं बन पाते हैं। बैलों से खेती हर तरह से लाभदाय है, इसके पीछे किसानों के तर्क को कृषि वैज्ञानिक कुछ हद तक सही मानते हैं।...

आखिरकार नहीं हो पाया उल्लू का राज्याभिषेक

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बोधकथा। सृष्टि के प्रथम निर्माण चक्र के तुरंत बाद मनुष्यों ने एक सर्वगुण-सम्पन्न पुरुष को अपना अधिपति बनाया, जानवरों ने सिंह को तथा मछलियों ने आनन्द नाम के एक विशाल मत्स्य को। इससे प्रेरित होकर पंछियों ने भी एक सभा की और उल्लू को भारी मत से राजा बनाने का प्रस्ताव रखा। राज्याभिषेक के ठीक पूर्व पंछियों ने दो बार घोषणा भी की कि उल्लू उनका राजा है किन्तु अभिषेक के ठीक पूर्व जब वे तीसरी बार घोषणा करने जा रहे थे तो कौवे ने काँव-काँव कर उनकी घोषणा का विरोध किया और कहा क्यों ऐसे पक्षी को राजा बनाया जा रहा था जो देखने से क्रोधी प्रकृति का है और जिसकी एक वक्र दृष्टि से ही लोग गर्म हांडी में रखे तिल की तरह फूटने लगते हैं। कौवे के इस विरोध को उल्लू सहन न कर सका और उसी समय वह उसे मारने के लिए झपटा और उसके पीछे-पीछे भागने लगा। तब पक्षियों ने भी सोचा की उल्लू राजा बनने के योग्य नहीं था क्योंकि वह अपने क्रोध को नियंत्रित नहीं कर सकता था। अत: उन्होंने हंस को अपना राजा बनाया। माना जाता है कि उल्लू और कौवों की शत्रुता तभी से आज तक चलती आ रही है।